कहार: चौथे वर्ष में बढ़ते कदम.....

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत अंग्रेजी नव वर्ष पर ‘कहार’ पत्रिका तथा ‘कहार अभियान’ की तरफ से आपको एक नयी शुरूआत के लिए शुभकामनाएँ। आपकी भागीदारी ही हमारी ताकत है और आपके विचार हमारे मार्गदर्शक हैं। हम विगत तीन वर्षों के आपके सहयोग के लिये आभारी है।

‘कहार’ को हमने एक प्रतीक की तरह लिया है। साझीदारी, निरन्तरता और पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक की तरह। ‘कहार’ उपहार की वस्तुओं को पैदल ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है, सामूहिक कार्यों में सक्रिय साझीदारी करता है तथा श्रम, पर मशीनों की दासता को हावी नहीं होने देता। इस प्रतीक को हमने एक अभियान का संकेत बनाया और अभियान का नाम रखा ”समावेशी विकास की ग्रामीण पहल“। इसमें हमने बड़ी संख्या में छोटी-छोटी लाइबेे्ररियाँ बनाने की परिकल्पना की। गांवों के टिकाऊ और स्वयंसेवी विकास के कार्यक्रमों की अवधारणा बनाई और ग्रामीण शिक्षा में कुछ महत्वपूर्ण योगदान की योजना भी बनाई। यह 2014 की बात है।

कहार पत्रिका इस अभियान के सहायक संवादक के रूप में निकाली गयी। आप पत्रिका के पूर्व अंकों ;ूूूणंींतण्पदद्ध का दुबारा देखेंगे, तो आपको स्मरण हो जायेगा कि हमने लगातार विज्ञान को तकनीकी से अधिक, एक अवधारणा और एक कार्यपद्धति की तरह देखे जाने की वकालत की है।

वैज्ञानिक पद्धति में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है – अपने विचारों, अवधारणाओं और तरीकों का नियमित पुनरावलोकन करना, सफलताओं.असफलताओं की विवेचना करना और उसी आधार पर आगे की योजनाओं की रूपरेखा बनाना।

हमने पहले वर्ष यानि 2014 में बड़ी संख्या में ग्रामीण लाइब्रेरियों एवं कहार ‘चेतना केन्द्रों’ को स्थापित करने की योजना बनायी। यूँ तो आज के युग को ज्ञान का युग माना जाता है। परन्तु हमारा मानना है कि हर याुग ज्ञान का युग ही रहा है। हर युग में शासन का वास्तविक संचालन तथा विकास के पहिये को दिशा देने का कार्य ज्ञानवानों के पास ही रहा है।

यह वैश्विक समझ है कि शिक्षा से ही गरीबी और बदहाली दूर की जा सकती है। भारतीय परिपे्रक्ष्य में भी दलित समाज तथा औरतों को मुख्यधारा में शामिल होने में शिक्षा की प्रमुख भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

गाँव विकास की मुख्यधारा से छूटे हुये उपेक्षित द्वीप हैं,जो अकेले अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और हार रहे है। उन्हीं की चुनी हुई सरकारें उनकी सुध नहीं लेती। उन्हीं की चुनी हुई पंचायते उनका शोषण करती हैं, और सरकारी तंत्र के कर्मचारी और अधिकारियों के साथ मिल कर उनके लिए आवंटित धन और साधनों का सहीं उपयोग नहीं करती। योजनाएँ कागजों पर बनती हैं तथा पूरी होती हैं। योजना का पैसा उसके संचालकों के अधियारे तंत्र में जहां.तहां बिखर जाता हैं। ‘प्रजातंत्र’ का ‘राजतंत्र’ गांवों तक इतनी अंधेरी सुरंगों से गुजर कर पहुंँचता है, कि उसकी भूल भुलैया से पार पाना

Kahaar : A Carrier for knowledge of Sustainable Development

(A multilingual magazine for common people)

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कहार, PHSS और SSCE शैक्षिक संस्थानों की साझी त्रैमासिक पत्रिका है, जो गांव के टिकाऊ विकास के ज्ञान को आम लोगो के बीच पहुँचाने के लिए समर्पित है| इसके अतिरिक्त यह पत्रिका स्कूली बच्चों को सम्बोंधित है ताकि उनको अपनी पुस्तकों से अधिक विस्तृत ज्ञान और विज्ञान विषय विशेषज्ञोंं द्वारा सीधे उनतक पहुँचाया जा सके |

Kahaar Magazine Volume 1 No.1, 2014

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कहार, PHSS और SSCE शैक्षिक संस्थानों की साझी त्रैमासिक पत्रिका है, जो गांव के टिकाऊ विकास के ज्ञान को आम लोगो के बीच पहुँचाने के लिए समर्पित है| इसके अतिरिक्त यह पत्रिका स्कूली बच्चों को सम्बोंधित है ताकि उनको अपनी पुस्तकों से अधिक विस्तृत ज्ञान और विज्ञान विषय विशेषज्ञोंं द्वारा सीधे उनतक पहुँचाया जा सके |